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गरीबी की विद्रूपता

युवा स्त्री बदन और कपड़े कम ,ये है गरीबी की विद्रूपता

यूँ मेरा रिश्ता नहीं है ,पर शरीर का रोआँ रोआँ है कांपता        

ईश्वर से नाराज हूँ,लड़ने को तैयार हूं,प्रभु तूने यह क्या किया

न्याय का खाता बही,तूने क्षण भर को,अलग क्यों नही किया

ये पाप की हो कोई सज़ा ,या पुण्य के अभाव का परिणाम हो

किसी सूरत ओ हाल में,ऐसा विध्वंशकारी तो न अभिमान हो

स्त्री है सृष्टि की निर्मात्री,और अत्यंत सम्मानित ये पात्र है

तूने इसी को शर्मशार कर दिया,या तेरी कोई भूल मात्र है

घुटनों से कैसे छिपाए जिस्म को,बाहों से यौवन क्योंकर ढके

जीवन पे है लानत हमारे,और अधिकार पे भी तेरे उत्पत्ति के      

शब्द मेरे खत्म हो गए,भावों में है अप्रत्याशित शून्यता          

न्याय में है दृढ़ता आवश्यक,पर प्रभु ये है तेरी निष्ठुरता

भूख से तड़पा दे इसे,पर आबरू की सुरक्षा तो हो बरकरार

नंगा है बदन आत्मा पर होंगी खरोंचे,न तू ऐसा अन्याय कर

मैंने माना पापों का संग्रह,इसने किया होगा सीमा से अधिक

पर प्रभु कुछ तो दयाकर,तू तो दुनिया में है दयालु सर्वाधिक

गलती थी तो योनि बदलता , मनुष्य योनि का न अपमान कर

मनुष्य योनि तो सर्वोत्तम है,इस पर आक्षेप का न सामान कर

तू है दुनिया का निर्माता ,किसी को भी न्याय पर तेरे शक नही

देखकर इस दृश्य को मेरी रूह कांपी,इसीलिए सब बातें कही

सृष्टि तेरी खूबसूरत बहुत है , तू भी  इसे थोड़ा थोड़ा प्यारकर

मैं तो हूँ एक तुच्छ प्राणी, कह गयाअधिक प्रभु मुझे  माफकर

धरती पर गीली खड़े हो, बात करते हो ऊंचाई की

झूठ के तो दलदल में फंसे हो,सोचते हो सच्चाई की

बुराइयां सौ मन में बसी हैं ,अच्छाई कहाँ से आएगी

झूठ, स्वार्थ की कशमकश से,क्या जान छूट पाएगी

सच्चाई जीनी है जिंदगी में,तो काम इतना कीजिये

झूठ,स्वार्थ की राख से,दिल दिमाग के बर्तन माँजीये

मोह,माया के दुनियावी जाल से, स्वयं को निकालिए

अहंकार रूपी राक्षस को, जिंदगी से आप लताड़िये

ईर्ष्या,द्वेष की जंजीरों से भी,न आप खुद को बांधिए

आत्मा को आप अपनी,सब दुराग्रहों से मुक्त राखिये

अब आप दुनिया की, हर बुराई से लड़ने को तैयार हैं

लड़ाई में जितने भी चाहिए,वो तैयार सब हथियार हैं

कस लो आप अपनी कमर,और निकल लो काम पर

काम है मेहनत भरा ,निगाह रखो न आप आराम पर

हर दुखी व अत्याचार पीड़ित की , मदद आप कीजिये

अपनी ईमानदारी, सच्चाई से ,दिल समाज का जीतिए

इस काम में धन दौलत नही,पर संतोष तो असीमित है

आप जैसे कर्मठ,ईमानदारों के कारण,गरीब जीवित है

आएंगी उलझन अनेकों , पर इरादा न बिल्कुल त्यागिये

धैर्य से रहिए जुटे,समझाइए औरों को भी आप जुटाइये